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07 May 2021

Astro tips


कुंडली फल कथन करने से पूर्व ध्यान रखने योग्य बातें :-
(अगर ज्योतिषी इन तथ्यों को फलित में मे उपयोग करें... तो सटीक फलादेश होगा।)
           
1. किसी भी ग्रह की महादशा में उसी ग्रह की अन्तर्दशा अनुकूल फल नहीं देती।
2. योगकारक ग्रह की महादशा में पापी या मारक ग्रह की अन्तर्दशा आने पर प्रारंभ में शुभ फल तथा उत्तरार्द्ध में अशुभ फल देने लगता है।
3. अकारक ग्रह की महादशा में कारक ग्रह की अन्तर्दशा आने पर प्रारंभ में अशुभ तथा उत्तरार्द्ध में शुभ फल की प्राप्ति होती है।
4. भाग्य स्थान का स्वामी यदि भाग्य भाव में बैठा हो और उस पर गुरु की दृष्टि हो तो ऐसा व्यक्ति प्रबल भाग्यशाली माना जाता है।
5. लग्न का स्वामी सूर्य के साथ बैठकर विशेष अनुकूल रहता है।
6. सूर्य के समीप निम्न अंशों तक जाने पर ग्रह अस्त हो जाते हैं, (चन्द्र-१२ अंश, मंगल-१७ अंश, बुध-१३ अंश, गुरु-११ अंश, शुक्र-९ अंश, शनि-१५ अंश) फलस्वरूप ऐसे ग्रहों का फल शून्य होता है। अस्त ग्रह जिन भावों के अधिपति होते हैं उन भावों का फल शून्य ही समझना चाहिए।
7. सूर्य उच्च का होकर यदि ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो ऐसे व्यक्ति अत्यंत प्रभावशाली तथा पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त व्यक्तित्व होता है।
8. सूर्य और चन्द्र को छोड़कर यदि कोई ग्रह अपनी राशि में बैठा हो तो वह अपनी दूसरी राशि के प्रभाव को बहुत अधिक बढ़ा देता है।
9. किसी भी भाव में जो ग्रह बैठा है, इसकी अपेक्षा जो ग्रह उस भाव को देख रहा होता है, उसका प्रभाव ज़्यादा रहता है।
10. जिन भावों में शुभ ग्रह बैठे हों या जिन भावों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो वे भाव शुभ फल देने में सहायक होते हैं।
11. एक ग्रह दो भावों का अधिपति होता है। ऐसी स्थिति में वह ग्रह अपनी दशा में लग्न से गिनने पर जो राशि पहले आएगी उसका फल वह पहले प्रदान करेगा।
12. दो केन्द्रों का स्वामी ग्रह यदि त्रिकोण के स्वामी के साथ बैठे हैं तो उसे केंद्रत्व दोष नहीं लगता और वह शुभ फल देने में सहायक हो
जाता है। सामान्य नियमों के अनुसार यदि कोई ग्रह दो केंद्र भावों का स्वामी होता है तो वह अशुभ फल देने लग जाता है चाहे वह जन्म-कुंडली में करक ग्रह ही क्यों न हो।
13. अपने भाव से केन्द्र व त्रिकोण में पड़ा हुआ ग्रह शुभ होता है।
14. केंद्र के स्वामी तथा त्रिकोण के स्वामी के संबंध हो तो वे एक दूसरे की दशा में शुभ फल देते हैं। यदि संबंध न हो तो एक की महादशा में जब दूसरे की अंतर्दशा आती है तो अशुभ फल ही प्राप्त होता है।
15. वक्री होने पर ग्रह अधिक बलवान हो जाता है तथा वह ग्रह जन्म-कुंडली में जिस भाव का स्वामी है, उस भाव को विशेष फल प्रदान करता है।
16. यदि भावाधिपति उच्च, मूल त्रिकोणी, स्वक्षेत्री अथवा मित्रक्षेत्री हो तो शुभफल करता है।
17. यदि केन्द्र का स्वामी त्रिकोण में बैठा हो या त्रिकोण केंद्र में हो तो वह ग्रह अत्यन्त ही श्रेष्ठ फल देने में समर्थ होता है। जन्म-कुंडली में पहला, पाँचवा तथा नवाँ भाव त्रिकोण स्थान कहलाते हैं। परन्तु कोई ग्रह त्रिकोण में बैठकर केंद्र के स्वामी के साथ संबंध स्थापित करता है तो वह न्यून योगकारक ही माना जाता है।
18. त्रिक स्थान (कुंडली के ३, ६, ११वे भाव को त्रिक स्थान कहते हैं) में यदि शुभ ग्रह बैठे हो तो त्रिक स्थान को शुभ फल देते हैं परन्तु स्वयं दूषित हो जाते हैं और अपनी शुभता खो देते हैं।
19. यदि त्रिक स्थान में पाप ग्रह बैठे हों तो त्रिक भावों को पापयुक्त बना देते हैं पर वे ग्रह स्वयं शुभ रहते हैं और अपनी दशा में शुभ फल देते हैं।
20. चाहे अशुभ या पाप ग्रह ही हो, पर यदि वह त्रिकोण भाव में या त्रिकोण भाव का स्वामी होता है तो उसमे शुभता आ जाती है।
21. एक ही त्रिकोण का स्वामी यदि दूसरे त्रिकोण भाव में बैठा हो तो उसकी शुभता समाप्त हो जाती है और वह विपरीत फल देते है। जैसे पंचम भाव का स्वामी नवम भाव में हो तो संतान से संबंधित परेशानी रहती है या संतान योग्य नहीं होती।
22. यदि एक ही ग्रह जन्म-कुंडली में दो केंद्र स्थानों का स्वामी हो तो शुभ फलदायक नहीं रहता। जन्म-कुंडली में पहला, चौथा, सातवाँ तथा दसवां भाव केन्द्र स्थान कहलाते हैं।
23. शनि और राहु विछेदात्मक ग्रह हैं अतः ये दोनों ग्रह जिस भाव में भी होंगे संबंधित फल में विच्छेद करेंगे जैसे अगर ये ग्रह सप्तम भाव में हों तो पत्नी से विछेद रहता है। यदि पुत्र भाव में हों तो पुत्र-सुख में न्यूनता रहती है।
24. राहू या केतू जिस भाव में बैठते हैं उस भाव की राशि के स्वामी समान बन जाते हैं तथा जिस ग्रह के साथ बैठते हैं, उस ग्रह के गुण ग्रहण कर लेते हैं।
25. केतु जिस ग्रह के साथ बैठ जाता है उस ग्रह के प्रभाव को बहुत अधिक बड़ा देता है।
26. लग्न का स्वामी जिस भाव में भी बैठा होता है उस भाव को वह विशेष फल देता है तथा उस भाव की वृद्धि करता है।
27. लग्न से तीसरे स्थान पर पापी ग्रह शुभ प्रभाव करता है लेकिन शुभ ग्रह हो तो मध्यम फल मिलता है।
28. तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में पापी ग्रहों का रहना शुभ माना जाता जाता है।
29. तीसरे भाव का स्वामी तीसरे में, छठे भाव का स्वामी छठे में या ग्यारहवें भाव का स्वामी ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो ऐसे ग्रह पापी नहीं रहते अपितु शुभ फल देने लग जाते हैं।
30. चौथे भाव में यदि अकेला शनि हो तो उस व्यक्ति की वृद्धावस्था अत्यंत दुःखमय व्यतीत होती है।
31. यदि मंगल चौथे, सातवें , दसवें भाव में से किसी भी एक भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति का गृहस्थ जीवन दुःखमय होता है। पिता से कुछ भी सहायता नहीं मिल पाती और जीवन में भाग्यहीन बना रहता है।
32. यदि चौथे भाव का स्वामी पाँचवे भाव में हो और पाँचवें भाव का स्वामी चौथे भाव में हो तो विशेष फलदायक होता है। इसी प्रकार नवम भाव का स्वामी दशम भाव में बैठा हो तथा दशम भाव का स्वामी नवम भाव में बैठा हो तो विशेष अनुकूलता देने में समर्थ होता है।
33. अकेला गुरु यदि पंचम भाव में हो तो संतान से न्यून सुख प्राप्त होता है या प्रथम पुत्र से मतभेद रहते हैं।
34. जिस भाव की जो राशि होती है उस राशि के स्वामी ग्रह को उस भाव का अधिपति या भावेश कहा जाता है। छठे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी जिन भावों में रहते हैं, उनको बिगाड़ते हैं, किन्तु अपवाद रूप में यदि यह स्वगृही ग्रह हों तो अनिष्ट फल नहीं करते, क्योंकि स्वगृही ग्रह का फल शुभ होता है।
35. छठे भाव का स्वामी जिस भाव में भी बैठेगा, उस भाव में परेशानियाँ रहेगी। उदहारण के लिए छठे भाव का स्वामी यदि आय भाव में हो तो वह व्यक्ति जितना परिश्रम करेगा उतनी आय उसको प्राप्त नहीं सकेगी।
36.यदि सप्तम भाव में अकेला शुक्र हो तो उस व्यक्ति का गृहस्थ जीवन सुखमय नहीं रहता और पति-पत्नी में परस्पर अनबन बनी रहती है।
37. अष्टम भाव का स्वामी जहाँ भी बैठेगा उस भाव को कमजोर करेगा।
38. शनि यदि अष्टम भाव में हो तो उस व्यक्ति की आयु लम्बी होती है।
39. अष्टम भाव में प्रत्येक ग्रह कमजोर होता है परन्तु सूर्य या चन्द्रमा अष्टम भाव में हो तो कमजोर नहीं
रहते।
40. आठवें और बारहवें भाव में सभी ग्रह अनिष्टप्रद होते हैं, लेकिन बारहवें घर में शुक्र इसका अपवाद है क्योंकि शुक्र भोग का ग्रह है बारहवां भाव भोग का स्थान है। यदि शुक्र बारहवें भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति अतुलनीय धनवान एवं प्रसिद्ध व्यक्ति होता है।
41. द्वादश भाव का स्वामी जिस भाव में भी बैठता है, उस भाव को हानि पहुँचाता है।
42. दशम भाव में सूर्य और मंगल स्वतः ही बलवान माने गए हैं, इसी प्रकार चतुर्थ भाव में चन्द्र और शुक्र, लग्न में बुध तथा गुरु और सप्तम भाव में शनि स्वतः ही बलवान हो जाते हैं तथा विशेष फल देने में सहायक होते हैं।
43.ग्यारहवें भाव में सभी ग्रह अच्छा फल करते हैं।
44. अपने स्वामी ग्रह से दृष्ट, युत या शुभ ग्रह से दृष्ट भाव बलवान होता है।
45. किस भाव का स्वामी कहाँ स्थित है तथा उस भाव के स्वामी का क्या फल है, यह भी देख लेना चाहिए। यदि कोई ग्रह जिस राशि में है उसी नवमांश में भी हो तो वह वर्गोत्तम ग्रह कहलाता है और ऐसा ग्रह पूर्णतया बलवान माना जाता है तथा श्रेष्ठ फल देने में सहायक होता है।

ज्योतिष और रोग


मेष लग्न में रोगों के संभावित योग
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मेष लग्न और रोग
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(1) मेष लग्न में षष्टेश बुध लग्न में पापग्रहों से दृष्ट हो तो ऐसा जातक जलस्राव से
अंधा होता है।

(2)मेष लग्न के चौथे भाव में पापग्रह हो तथा चतुर्थेश चंद्रमा पापग्रहों के मध्य हो
तो जातक को हृदय रोग होता है।

(3) मेष लग्न में चंद्रमा यदि मंगल के साथ अष्टम स्थान में हो तो जातक को हृदय
रोग होता है ।

(4) मेष लग्न में चतुर्थश चंद्रमा मिथुन, कन्या या वृश्चिक का हो एवं निर्बल हो तो
जातक को हृदय रोग होता है।

(5) मेष लग्न में शनि कर्क का, षष्टेश बुध एवं सूर्य अन्य पापग्रहों के साथ या,
पापमध्य हो तो जातक को हृदय रोग होता है।

(6) जातक पारिजात के अनुसार मेष लग्न में चौथे और पांचवें भाव में पापग्रह हो तो
व्यक्ति को हदय रोग होता है।

(7) मेष लग्न में कर्क का शनि एवं कुंभ का सूर्य हो तो व्यक्ति को हृदय रोग होता
है।

(8) मेष लग्न में चतुर्थ स्थान में राहु अन्य पापग्रहों से दृष्ट हो तथा लग्नेश मंगल
निर्बल हो तो जातक को असह्य हृदयशूल (हार्ट-अटैक) होता है ।

(9) मेष लग्न में वृश्चिक का सूर्य पापग्रहों के मध्य हो, पापदृष्ट हो तो जातक को
असह्य हृदयशूल (हार्ट-अटैक) होता है ।

(10) मेष लग्न में मंगल+ चंद्रमा + शनि एक साथ दुःस्थान में हों तो वाहन दुर्घटना
से मृत्यु होती है।

(11) मेष लग्न में मंगल + शनि लग्नस्थ हो, चंद्रमा चौथे, सूर्य + शुक्र बारहवें हो तो
जातक को 24 वर्ष की आयु में भयंकर पीलिया, रक्त-पित्त दोष होता है।

(12) मेष लग्न में लग्नस्थ पापग्रह हो, लग्न का स्वामी मंगल बलहीन हो तो सदैव रोगी होता है।

(13) मेष लग्न में क्षीण चंद्रमा बलहीन हो, किसी पापग्रह की लग्न पर दृष्टि हो तो
व्यक्ति सदैव रोगी रहता है।

(14) मेष लग्न में मंगल चौथे या द्वादश भाव में शनि+ बुध के साथ हो तो जातक
कुष्ठ रोग से पीड़ित रहता है।

(15) मेष लग्न में शनि + चंद्रमा से युत होकर लग्नस्थ हो, बृहस्पति छठे भाव में हो तो जातक कुष्ठ रोग से पीड़ित रहता है।

(16) मेष लग्न में उच्च का बृहस्पति केंद्र में हो, बुध त्रिकोण में हो तथा मंगल बलवान
हो तो जातक 80 वर्ष की स्वस्थ आयु प्राप्त करता है।

(17) मेष लग्न में लग्नेश मंगल लग्न को देखता हो, सभी शुभग्रह केंद्र में हों तो
जातक 75 वर्ष की स्वस्थ आयु को प्राप्त करता है ।

(18) मेष लग्न में मंगल हो, अथवा मंगल पांचवें सिंह का तथा सूर्य सातवें तुला का
हो तो जातक 70 वर्ष की निरोग आयु को प्राप्त करता है ।

(19) मेष लग्न में शनि+मंगल+ सूर्य हो, चंद्रमा द्वादश में तथा गुरु बलहीन हो तो
ऐसा जातक 70 वर्ष तक जीता है।

(20) मेष लग्न में चंद्रमा+ सूर्य दसम भाव में, शनि नीच का लग्न में, बृहस्पति कर्क
का चतुर्थ भाव में हो तो एक प्रकार के उच्च राजयोग की सृष्टि होती है पर ऐसा
जातक मात्र 68 वर्ष तक ही जी पाता है।

(21) यदि शनि लग्न में, कर्क का चंद्रमा चौथे, मंगल सातवें और सूर्य दसवें किसी भी अन्य शुभ ग्रह के साथ हो तो ऐसा जातक राजा तुल्य ऐश्वर्य को भोगता हुआ
60 वर्ष की आयु में गुजर जाता है।

(22) मेष लग्न में अष्टमेश मंगल सातवें हो तथा चंद्रमा छठे या आठवें स्थान में
पापग्रहों के साथ हो तो व्यक्ति 58 वर्ष की आयु में गुजर जाता है।

(23) शनि लग्न में किसी भी अन्य ग्रह के साथ हो, चंद्रमा आठवें या द्वादश स्थान में
हो तो ऐसा जातक सैद्धांतिक तथा विद्वान् होता हुआ 52 वर्ष की आयु में ही गुजर जाता है।

(24) मेष लग्न में बलवान चंद्रमा लग्न में हो पर सूर्य से 120 अंश दूर हो तो जातक
राजातुल्य ऐश्वर्य को भोगता हुआ 48 वर्ष की आयु में गुजर जाता है।

(25) मेष लग्न में लग्नेश मंगल अष्टम भाव में पापग्रहों के साथ हो, और छठे स्थान
में बुध पापग्रहों के साथ हो तथा शुभग्रहों से दृष्ट न हो तो जातक मात्र 45 वर्ष तक ही जीता है।

(26) मेष (चर) लग्न में चंद्रमा कन्या या वृश्चिक का शुभग्रहों से दृष्ट न हो, कोई भी
शुभ ग्रह केंद्र में न हो तो जातक मात्र 33 वर्ष तक जीता है।

(27) मेष लग्न में शनि+ मंगल लग्नस्थ हो, चंद्रमा आठवें एवं बृहस्पति छठे हो तो
जातक 32 वर्ष की अल्पायु को प्राप्त होता है।

(28) मेष लग्न के द्वितीय व द्वादश भाव में पापग्रह हो, लग्नेश निर्बल हो, लग्न, द्वितीय
व द्वादश भाव शुभग्रहों से दृष्ट न हो तो जातक 32 वर्ष की अल्पायु को प्राप्त
होता है।

(29) मेष का बृहस्पति एवं मीन का मंगल परस्पर एक-दूसरे के घर में बैठने से
'बालारिष्ट योग' बनता है ऐसे जातक की मृत्यु 12 वर्ष के भीतर होती है।

(30) मेष लग्न में चौथे राहु तथा चंद्रमा आठवें शुभ ग्रहों से दृष्ट न हो तो बालारिष्ट
योग बनता है। ऐसा जातक आठ वर्ष के पूर्व मृत्यु को प्राप्त होता है।

(31) मेष लग्न में अष्टमेश मंगल छठे स्थान में षष्टेश बुध के साथ हो, शनि सप्तम में
अन्य पापग्रहों के साथ हो, अष्टम स्थान में भी पापग्रह हो तो जातक 31 वर्ष की
आयु में ही शल्य चिकित्सा या गुप्तरोग के कारण मृत्यु को प्राप्त करता है।

(32) मेष लग्न में मंगल हो, बृहस्पति बारहवें हो, शुक्र छठे स्थान में नीच का हो, शुभ ग्रहों की लग्न पर दृष्टि न हो तो उपाय न करने पर ऐसे जातक की एक माह में
मृत्यु हो जाती है।

(33) मेष लग्न में सूर्य+चंद्रमा यदि कन्या राशि में, शुभ ग्रहों से दृष्ट न हो तो
'बालारिष्ट योग' बनता है तथा बालक की नौ वर्ष की आयु में मृत्यु होती है।

(34) मेष लग्न में बृहस्पति लग्नस्थ हो, चंद्रमा छठे या आठवें, शुभ ग्रहों से दृष्ट न हो तो 'बालारिष्ट योग' बनता है । ऐसे जातक की आयु आठ वर्ष की होती है ।

(35) मेष लग्न में सूर्य द्वादश में, चंद्रमा छठे या आठवें, शुभ ग्रहों से दृष्ट न हो तो
जातक की 'तत्काल मृत्यु' हो जाती है।

(36) मेष लग्न के लग्न या पंचम भाव में सूर्य+राहु+शनि+मंगल+ गुरु इन पांच
ग्रहों की युति हो, चंद्रमा निर्बल हो तो जातक शीघ्र मर जाता है।

(37) मेष लग्न के सप्तम भाव में सूर्य के साथ राहु या केतु हो तो ऐसा बालक
'मातृघातक' होता है।

(38) मेष लग्न के चतुर्थ भाव में मंगल के साथ राहु या केतु हो तो ऐसा बालक
'मातृघातक' होता है।

(39) मेष लग्न में लग्नस्थ शनि के साथ राहु या केतु हो तो ऐसा जातक 'मातृघातक'
होता है।

(40) लग्न एवं लग्नेश दोनों पापग्रहों के मध्य हों, सप्तम में पापग्रह हो तथा
आत्मकारक सूर्य निर्बल हो तो ऐसा जातक जीवन से निराश होकर आत्महत्या
करता है।

(41) मेष (चर) लग्न में चंद्रमा पापग्रह के साथ हो, सप्तम में शनि हो तो जातक देवता के शाप या शत्रुकृत अभिचार से पीड़ित रहता है।

नोट👉 जन्म कुंडली मे उपरोक्त योग किसी भी एक या दो ग्रह के उच्च अथवा शुभ होने पर परिवर्तित भी हो सकते है लेकिन इन योगों का फल कम या अधिक मिलता अवश्य है। ऐसा बहुत कम ही देखा गया है कि उपरोक्त योग वाले जातकों पर ये नियम मान्य ना हो।